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#MeToo

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ना जानियो मुझको मेनका, ओ ब्रह्मचारी
कोई मतलब नहीं मुझे जो भंग करू तेरी तपस्या सारी

ना ही मानियो कि हूं मै सीता बेचारी
शक करेगा तो भी ना जाऊंगी अग्नि में मारी

ना ही हूं मै प्रचंड रूप वाली काली
कुपित है तू, भला बनू क्यों तेरा खून पीने वाली

दुर्गा भी नहीं हूं, संसार का दुख हरनेवाली
मै नहीं हूं वो जिसने ये सृष्टि संहारी

लड़ना भी नहीं आता जो समझे मुझे झांसी की रानी
ना खून बहाया मैंने, ना मै खूब लड़ी मर्दानी

अबला मान या मान मुझे सबला
तेरे कहने से कुछ भी तो नहीं बदला

तुझे कौनसा कहा मैंने राम या रावन
जो इस तरह झांके है तू मेरा मन

योगी ना जान खुदको तू बेईमान
ज़रा मुखौटा तो हटा, देखे ये जहान

कौन बना फ़िर रहा है मेरा रक्षक
क्या कौरव, क्या पांडव, निकले तो सब भक्षक ।

 –  अंशिका मल्होत्रा

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तो क्या हुआ दूर हूं तो ?

 

तो क्या हुआ दूर हूं तो ?
ये जो चांद दिख रहा है आधा 
कौनसा होगा उसके हिस्से ज़्यादा

 
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तो क्या हुआ दूर हूं तो ?
सिरहाने को जब समझा उसका हाथ
सोया था तब वो ही मेरे साथ

 
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तो क्या हुआ दूर हूं तो ?
जब जब मुझको हुआ कोई अाघात
ध्यान में आई बस उसकी ही बात

तो क्या हुआ दूर हूं तो ?
नहीं है वो यहा तो कोई गिला नहीं
क्योंकि उस जैसा कभी कोई मिला नहीं

तो क्या हुआ दूर हूं तो ?
उसके होने का हर पल रहता है एहसास
देखो, अभी भी बैठा है मेरे ही पास

 
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तो क्या हुआ दूर हूं तो ?
महसूस करती हूं जब भी उसकी आहटें
खुद – बखुद आ जाती है मुस्कुराहटें

तो क्या हुआ दूर हूं तो ?
देखो तो मेरे प्यार की सच्चाई
अभी फ़िर से उसको मेरी याद आई

तो क्या हुआ दूर हूं तो ?
शर्मा जाती हूं आए जो उसका ख्याल
यही मंज़र चल रहा है हाल – फिलहाल

तो क्या हुआ दूर हूं तो ?
इतनी शिद्दत है उसे देने की मोहब्बत
दूर होकर भी लगती है उससे बेइंतहां कुरबत ।

 

  अंशिका मल्होत्रा

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कम कहता हूं मैं

तू यू गुज़री आंखों के सामने से

जुल्फों ने तेरी हाथ सहलाया मेरा

महक तेरे जिस्म की रूह में भर रही

मन ही मन में बहका रहता हूं मैं

माफ़ कर पाओगी गर कहूं कम कहता हूं मैं।

 

जानता हूं तेरे इशारों को खूब

उंगली से उस लट को पीछे करना तेरा

कनखियो से देखती हैं तेरी निगाहे मुझे

आंखें मूंद कर थोड़ा शरमा लेता हूं मैं

मान जाना गर लगे कि कम कहता हूं मैं।

 

लगाती हो ये बिंदी अपने माथे पर

काजल भी जचता है तुम्हारे नैनों में

गिराया था अपना दुपट्टा जानबूझकर मेरे पास में

चलो ,प्यार समझकर उठा लेता हूं  मैं

नि:शब्द ही लौटा दूंगा क्यूकी कम कहता हूं मैं।

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आज जब आई हो हारकर खुद ही करीब

तेज से भरी आंखें देख रह गया दंग मैं

ये अरूण कपोलों पर लाली है या आक्रोश तुम्हारा

चलो, अपनी खामोशी से ही समझा देता हूं मैं

बाकी जानती तो हो कि कम कहता हूं मैं।

 

इतना आग्रह जो कर रही थी तुम

इसलिए प्यार की बात बता ही दी तुम्हे

अब खुश हो इतनी कि आंसू बेह रह हैं तुम्हारे

गिला हो रहा है इतना कि अब ये सोचता हूं मैं

अच्छा ही है ,जो कम कहता हूं मैं ।

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  अंशिका मल्होत्रा

 

     

                                                                                            

 

 

 

 

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COMMENSALISM

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How much of an Orchid you are?

So beautifully bloomed in the shade of a tree

In the VIBGYOR of colours, you camouflage yourself in

A fragrance so vehement, enough to allure me.

 

Such bliss of uniqueness in a single flower

Blessed with both in tandem-

One deriving the ancestral characters of love;Synapomorphy

Also, the one having its own romance;Apomorphy

 

Although holds the justice of bilateral symmetry,

Unfortunately, resupinate on a mango tree.

O dear Orchid! Why would you let the tree host you?

Why would you not live on your own?

 

CAN’T YOU SEE WHAT I CAN SEE?

 

You don’t take benefit from the tree

And yet it takes the credit of your charm.

It holds the soil beneath firmly to stand abreast

And let you dangle on its branch with no harm.

 

O dear Orchid! Stop being the reliant you.

Be a white rose instead

With a black rose like me

We shall graft out our way together

Being the epic monochromatic beauty!

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IN YOUR ARMS

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All aware, still here
In all conscious
Still to get the hold of my breath
Losing my conscience
Feeling all numb
Thinking how would I die?

A romantic death?
When he would be holding my waist
Looking into each other’s eyes
Rolling tears turning ice
I don’t need the luxury of pottery barn
I would want to die in your arms.

An adventurous death?
I would feel my body to be stiff
When they would push me off the cliff
Hoping I would return as it is
But then the knife of air would cut the rope
And I see the waves in a hope
Telling the sea not to be calm
I would want to die in your arms.

A silent death?
Lying on my bed
My blood playing the part
The flow slows itself down
As if it is to drown
The death will lose its charm
Still telling the bed that
I would want to die in your arms.

A suicidal death?
In some depression
A gloomy mood
Gulping the tablets
When the sun rises
Not even listening to the alarm
Telling the dawn
I would want to die in your arms!