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FIND ME

Now that I've gone
Your soul will roam, yet won't be free
in those nooks and corners
where you expected to find me !
In the shabby Charles Dickens' towns
In the urban sprawls and agglomerations
Amidst the crowds of the capital
where you'd find me in your expectations !
You'll look for me in the common places
expect me to appear in front of you again
You'll wish to see me at least once
at places where you used to find me now and then !
Time goes on
and the bygones will be bygones
Yet you'll be sailing on the still waters
trying hard to move on !

-Anshika Malhotra

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दरिया

मेरे  इस  किनारे से जाने का आ गया है वक़्त
जिस किनारे पर है मेरा आशियाना
मां का आंचल, मेहबूबा की गोद
भाई की हिफाज़त, पिता का संरक्षण ।

साथ तो ले जाऊंगा बस एक बस्ता
जिसमें भरूंगा यादों का पिटारा
शायद ना समेट पाऊ सब
इसलिए आऊंगा लौट कर दुबारा ।

एकदम नया होगा सफ़र
अनजाने से होंगे लोग
नई मशाले जलाऊंगा अब
और शायद बने नए संजोग ।

मेरी कश्ती का मैं होऊंगा नाविक
ये दरिया होगा मेरा पथ प्रदर्शक
कभी उठेंगे उफ़ान भयंकर
कभी डगमग होगी नाव मेरी
हर मील पर होगा इम्तेहान
लहरें होगी मेरी परीक्षक ।

इस सागर के विशाल घमंड से
भयभीत ही सही, लड़ जाऊंगा मैं
हर मुसीबत को लांघ कर
हर पड़ाव को पार कर
वापिस उस किनारे को आऊंगा मैं ।

हलक से निवाला उतरेगा तो मेरे
पर पेट नहीं, मन भर आएगा
मेरी उस मां का खयाल आएगा मुझे
जो बोली थी: बेटा वहां रोटी कौन खिलाएगा ?

सैर- सपाटा तो होगा निश्चिंत
देखूंगा जो होगा अभूतपूर्व
आंखें भर आएंगी, सोचकर चार दिवारी
जहा छोटे भाई से की बातें ढेर सारी ।

सुबह की किरणों से भी पहले
पक्षियों को जगाऊंगा मैं
सोचकर चेहरे पर आएगी मुस्कुराहट
बिस्तर से फट उठ जाता था डर कर
मात्र सुनकर पिता की आहट ।

तादाद में दिखेंगी यूं तो अप्सराएं
होगी हुस्न की काफ़ी नुमाइश
पर मेरी हर बात को सुनने वाली तो तू
और कौन करेगा पूरी ये ख्वाहिश ?

मेरा स्रोत भी वही किनारा
मेरी मंज़िल भी वही किनारा
इस ही दरिया के द्वारा
लौटकर आऊंगा फ़िर दोबारा ।

–  अंशिका मल्होत्रा

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#MeToo

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ना जानियो मुझको मेनका, ओ ब्रह्मचारी
कोई मतलब नहीं मुझे जो भंग करू तेरी तपस्या सारी

ना ही मानियो कि हूं मै सीता बेचारी
शक करेगा तो भी ना जाऊंगी अग्नि में मारी

ना ही हूं मै प्रचंड रूप वाली काली
कुपित है तू, भला बनू क्यों तेरा खून पीने वाली

दुर्गा भी नहीं हूं, संसार का दुख हरनेवाली
मै नहीं हूं वो जिसने ये सृष्टि संहारी

लड़ना भी नहीं आता जो समझे मुझे झांसी की रानी
ना खून बहाया मैंने, ना मै खूब लड़ी मर्दानी

अबला मान या मान मुझे सबला
तेरे कहने से कुछ भी तो नहीं बदला

तुझे कौनसा कहा मैंने राम या रावन
जो इस तरह झांके है तू मेरा मन

योगी ना जान खुदको तू बेईमान
ज़रा मुखौटा तो हटा, देखे ये जहान

कौन बना फ़िर रहा है मेरा रक्षक
क्या कौरव, क्या पांडव, निकले तो सब भक्षक ।

 –  अंशिका मल्होत्रा

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तो क्या हुआ दूर हूं तो ?

 

तो क्या हुआ दूर हूं तो ?
ये जो चांद दिख रहा है आधा 
कौनसा होगा उसके हिस्से ज़्यादा

 
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तो क्या हुआ दूर हूं तो ?
सिरहाने को जब समझा उसका हाथ
सोया था तब वो ही मेरे साथ

 
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तो क्या हुआ दूर हूं तो ?
जब जब मुझको हुआ कोई अाघात
ध्यान में आई बस उसकी ही बात

तो क्या हुआ दूर हूं तो ?
नहीं है वो यहा तो कोई गिला नहीं
क्योंकि उस जैसा कभी कोई मिला नहीं

तो क्या हुआ दूर हूं तो ?
उसके होने का हर पल रहता है एहसास
देखो, अभी भी बैठा है मेरे ही पास

 
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तो क्या हुआ दूर हूं तो ?
महसूस करती हूं जब भी उसकी आहटें
खुद – बखुद आ जाती है मुस्कुराहटें

तो क्या हुआ दूर हूं तो ?
देखो तो मेरे प्यार की सच्चाई
अभी फ़िर से उसको मेरी याद आई

तो क्या हुआ दूर हूं तो ?
शर्मा जाती हूं आए जो उसका ख्याल
यही मंज़र चल रहा है हाल – फिलहाल

तो क्या हुआ दूर हूं तो ?
इतनी शिद्दत है उसे देने की मोहब्बत
दूर होकर भी लगती है उससे बेइंतहां कुरबत ।

 

  अंशिका मल्होत्रा

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कम कहता हूं मैं

तू यू गुज़री आंखों के सामने से

जुल्फों ने तेरी हाथ सहलाया मेरा

महक तेरे जिस्म की रूह में भर रही

मन ही मन में बहका रहता हूं मैं

माफ़ कर पाओगी गर कहूं कम कहता हूं मैं।

 

जानता हूं तेरे इशारों को खूब

उंगली से उस लट को पीछे करना तेरा

कनखियो से देखती हैं तेरी निगाहे मुझे

आंखें मूंद कर थोड़ा शरमा लेता हूं मैं

मान जाना गर लगे कि कम कहता हूं मैं।

 

लगाती हो ये बिंदी अपने माथे पर

काजल भी जचता है तुम्हारे नैनों में

गिराया था अपना दुपट्टा जानबूझकर मेरे पास में

चलो ,प्यार समझकर उठा लेता हूं  मैं

नि:शब्द ही लौटा दूंगा क्यूकी कम कहता हूं मैं।

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आज जब आई हो हारकर खुद ही करीब

तेज से भरी आंखें देख रह गया दंग मैं

ये अरूण कपोलों पर लाली है या आक्रोश तुम्हारा

चलो, अपनी खामोशी से ही समझा देता हूं मैं

बाकी जानती तो हो कि कम कहता हूं मैं।

 

इतना आग्रह जो कर रही थी तुम

इसलिए प्यार की बात बता ही दी तुम्हे

अब खुश हो इतनी कि आंसू बेह रह हैं तुम्हारे

गिला हो रहा है इतना कि अब ये सोचता हूं मैं

अच्छा ही है ,जो कम कहता हूं मैं ।

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  अंशिका मल्होत्रा

 

     

                                                                                            

 

 

 

 

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REINSTATE

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Signs of stories unknown
Seeds of love have been resown!

Got the comfort I was looking for
The warmth of your hug and voice that I adore.

Smiles restored and happiness reconfirmed
Ya you bet, that’s you who reaffirmed!

Something for which I had a quest
Yes, it’s you in whom I remanifest!

One sure thing I shall clarify
It’s the true belief that we live by!

One last time the separated talks
Then there shall be a lot in the long walks!

One more time it shall be you
Yet to be a restart though

The conflicts are over which extinguished the spark
And hence we are here to reignite in the dark!

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– ANSHIKA MALHOTRA

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नए किस्से शुरू होते है बरसात में

Screenshot_20180725-121535__01.jpgनए किस्से शुरू होते है बरसात में
पेड़ों की हरियाली हो या
मोर नाचे छत के आयात पे
नए किस्से शुरू होते है बरसात में

हुआ सावन का आगमन
बरस बरस दे जाते है
मेघ भी शीतलता ये सौगात में
नए किस्से शुरू होते है बरसात में

ये मौसम याद दिलाता है
दिन जो ना है अब मेरे हाथ में
पुराने किस्से दे जाते है आंसू आंख में
नए किस्से शुरू होते है बरसात में

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पहले प्यार का तोहफा हो
या बहकी बहकी हसीन रात हो
दिल को छेड़ने वाली नहीं लगी
जो बात थी उस आखिरी मुलाकात में
नए किस्से शुरू होते है बरसात में

आज फिर आगमन हुआ
छम छम करती बूंदों का
देख रही हूं छज्जे से बाहर
बैठी उसके साथ में
नए किस्से शुरू होते है बरसात में ।

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