कम कहता हूं मैं

तू यू गुज़री आंखों के सामने से

जुल्फों ने तेरी हाथ सहलाया मेरा

महक तेरे जिस्म की रूह में भर रही

मन ही मन में बहका रहता हूं मैं

माफ़ कर पाओगी गर कहूं कम कहता हूं मैं।

 

जानता हूं तेरे इशारों को खूब

उंगली से उस लट को पीछे करना तेरा

कनखियो से देखती हैं तेरी निगाहे मुझे

आंखें मूंद कर थोड़ा शरमा लेता हूं मैं

मान जाना गर लगे कि कम कहता हूं मैं।

 

लगाती हो ये बिंदी अपने माथे पर

काजल भी जचता है तुम्हारे नैनों में

गिराया था अपना दुपट्टा जानबूझकर मेरे पास में

चलो ,प्यार समझकर उठा लेता हूं  मैं

नि:शब्द ही लौटा दूंगा क्यूकी कम कहता हूं मैं।

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आज जब आई हो हारकर खुद ही करीब

तेज से भरी आंखें देख रह गया दंग मैं

ये अरूण कपोलों पर लाली है या आक्रोश तुम्हारा

चलो, अपनी खामोशी से ही समझा देता हूं मैं

बाकी जानती तो हो कि कम कहता हूं मैं।

 

इतना आग्रह जो कर रही थी तुम

इसलिए प्यार की बात बता ही दी तुम्हे

अब खुश हो इतनी कि आंसू बेह रह हैं तुम्हारे

गिला हो रहा है इतना कि अब ये सोचता हूं मैं

अच्छा ही है ,जो कम कहता हूं मैं ।

Favim.com-27315

 

  अंशिका मल्होत्रा

 

     

                                                                                            

 

 

 

 

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